रसगुल्लापुर जंगल में एक पुरानी कहावत मशहूर थी: “बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!”
ये कहावत हर बात में फिट कर दी जाती थी।
हाथी कहता, “अरे मोर क्या समझे बारिश का मज़ा!”
तोता जोड़ देता, “जैसे बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!”
जब भी कोई जानवर किसी चीज़ की कीमत न समझे, बस सब मिलकर यही बोलते, “बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!”
बंदर बेचारा बबलू रोज़ ये सुन-सुनकर पक गया था।
उसने अपने बाल खींचे, पूँछ झटकाई और बोला, “आज ये कहावत हमेशा के लिए बदल दूँगा!”
“ऑपरेशन अदरक” शुरू!
अगली सुबह बबलू मंडी पहुँचा।
सब्ज़ी वाले से बोला, “भाई, अदरक कितने की?”
सब्ज़ीवाला बोला, “तेरे जैसे बंदर के लिए मुफ़्त!”
बबलू बोला, “वाह! स्वाद चखकर मैं जंगल का इतिहास बदल दूँगा!”
वो अदरक लेकर झरने के पास पहुँचा, सारे जानवर इकट्ठा हो गए।
तोता कैमरा लाया, हिरन ने माइक पकड़ा, हाथी ने कहा, “लाइव देखेंगे बंदर का अदरक अनुभव!”
अफरा–तफरी!
बबलू ने अदरक का टुकड़ा उठाया, थोड़ा सूंघा, और बोला, “अरे इतना तो आम जैसा लग रहा है…”
और फिर मुँह में डाल लिया।
जैसे ही अदरक दाँतों से टकराई, चेहरे के अंदर का सब कुछ हिल गया!
आँखें सिकुड़ीं, कान फड़फड़ाए, और पूँछ खड़ी हो गयी!
“अरे ये क्या है! लगता है मुँह में तूफ़ान आ गया!”
बबलू झरने की तरफ भागा, मुँह डुबोया, फिर बोला, “मुझे तो लगा था फ्लेवर है… ये तो फायर है!”
जंगल की हँसी सभा— ‘अदरक सम्मेलन 2025’
बबलू के मुँह से धुआँ निकलते ही पूरा जंगल हँसी से लोटपोट हो गया!
तोता अपने पंख थपथपाते हुए बोला, “अब पता चला कहावत क्यों बनी थी? और अब तो तू खुद कहावत बन गया!”
हाथी अपनी सूँड से ताली बजाते हुए बोला, “भाई, बंदर अब जान गया अदरक का स्वाद!”
ऊँट ने कहा, “इतनी लंबी गर्दन में भी इतना झटका कभी नहीं लगा मुझे!”
बकरी बोली, “मुझे तो लगा तू नाचने लगा है, फिर समझ आया, ये तो जीभ की आग है!”
साँप हँसते-हँसते बोला, “भाई, अब तुझे मैं क्या काटूँ, तू खुद ही तीखा है!”
बबलू ने मुँह पोंछा, खाँसते हुए बोला, “हाँ, अब मैं ही सबको बताऊँगा कि इस स्वाद में कोई स्वाद नहीं, और ये कहावत मुफ़्त में नहीं बनी थी, भाई!”
अगले दिन की सुर्खियाँ: रसगुल्लापुर जंगल का ब्रेकिंग न्यूज़!’
“बंदर ने अदरक खाई, जंगल में लगी आग; कहावत को मिला आधिकारिक प्रमाणपत्र!” “बंदर बोला: अब समझ आया, क्यों इंसान इसे चाय में छुपाकर पीता है!”

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