Talesmith

Touching People's Lives By Creative Stories

गुब्बारे वाला

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– Talesmith की कविता

नज़र हट नहीं रही थी उसकी सड़क पर से,
न जाने किस सोच में डूबा था बेचारा।
‘एक रोटी का इंतेज़ाम हो जाए औलाद के लिए,
गर ख़रीद ले जाए कोई मुझसे ये गुब्बारा।’

‘कीमत इसकी ज़्यादा नहीं है मालिक,
और नीयत मेरी एकदम साफ है।
पीछे पड़ जाऊँ बेचने के लिए तो बक्श देना साहब,
ये गुनाह तो माफ है। ‘

‘ख़्वाहिश बड़ा बनने का बिलकुल नहीं है,
मैं तो बस आज में जीता हूँ।
खाने को मिल जाए तो ठीक,
वरना मैं बस पेट भर पानी पीता हूँ। ‘

दिखता बाहर से ख़ामोश ज़रूर है ये,
अंदर तूफान पाल रहा है।
कुछ न होते हुए भी न जाने कैसे,
ये सब कुछ सँभाल रहा है।

ज़िंदगी बेरंग है इसकी,
मगर गुब्बारा हर किस्म का रखता है।
इसके बच्चों की पड़ी है बस इसको,
ख़याल कहाँ ये अपने जिस्म का रखता है।

बेच रहा था ‘दस के दो,’
मैं दस का एक ले आया।
सोचा कर लेता हूँ अच्छा काम,
पैसे ज़्यादा मैं दे आया।

वो दौड़कर आया मेरे पास,
कहा, ‘एक और गुब्बारा ले जाना,
आपके घर भी अगर एक बच्चा हो,
तो मेरा ये तोहफा दे आना।’

समझ नहीं आया उस वक्त,
मैं बस वहीं गया ठहर।
लगा नहीं वो ग़रीब किसी तरह से,
और थम सी गयी मेरी नज़र।

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